IUNNATI CHANAKYA NITI  चाणक्य नीति 

 चाणक्य नीति 

✒️ तृतीय अध्याय

श्लोक :- ६

प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः। 

सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेअ्पि न साधवः।।६।। 

भावार्थ — प्रलय काल में सागर भी अपनी मर्यादा को छोड़ देता है। वह तटों को भी पार कर जाता है। किंतु भले लोग प्रलय आने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ते 

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