वैधनाथ ज्योतिर्लिंग

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मुख्य शिव मंदिर वैधनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर झारखंड राज्य के देवघर जिले में स्थित है। यह एक प्रमुख शिव मंदिर है और भारतीय धर्म में उत्तम तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। यहाँ चिकित्सा , उपचार प्रकृति और स्वास्थ्य के देवता के रूप में विराजमान है
देवघर का नाम अपने धार्मिक महत्व के कारण प्रसिद्ध है। यहां पर भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग स्थित है, जिसे वैधनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है। देवघर के शिव मंदिर में अनेक धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है, और विभिन्न पूजा-अर्चना की व्यवस्था होती है।
इसे बैधनाथ धाम भी कहते है।यह एक सिद्धपीठ भी है इसीलिए इसे कामना लिंग भी कहते है।
विश्व के सभी शिवमंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दिखाई देता है लेकिन यहाँ त्रिशूल की जगह पंचशूल लगा हुआ है।
देवघर झारखंड में प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में से एक है। यहां का मंदिर प्राचीन शैली में बना है और इसकी विशेषता, भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के रूप में है। देवघर का मंदिर पर्यटन के लिए भी बहुत लोकप्रिय है, और वहां के प्राचीन और धार्मिक महत्व को देखते हुए लोग यहां आते हैं।
वैधनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की संरचना बहुत ही विशेष और प्राचीन है। यह मंदिर भारतीय वास्तुशिल्प के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है और उसकी संरचना में कई महत्वपूर्ण तत्व हैं।
इस मंदिर का मुख्य स्थान गर्भगृह होता है, जहां पर वैधनाथ ज्योतिर्लिंग स्थित है। यहां भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है।
गर्भगृह के सामने एक छोटा मंदप होता है, जहां पर पूजा और आरती का कार्यक्रम संचालित होता है। यहां भक्तगण भगवान के लिए प्रार्थना करते हैं।
मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुर कहा जाता है, जो मंदिर के विशाल और भव्य शिखरों से अलंकृत होता है। यहां द्वार के दोनों ओर से चित्रों और नक्काशियों से सजे देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखी जाती हैं।
मंदिर के मुख्य भवन के चारों ओर एक विशाल प्रांगण होता है, जो भक्तों के लिए ध्यान और आदर्श स्थान होता है। यहां धार्मिक अनुष्ठानों, परंपरागत उत्सवों और ध्यान के लिए स्थान होता है।
कुंड या पवित्र तालाब मंदिर के प्रांगण में होता है, जो शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक होता है। यहां श्रद्धालुगण स्नान करते हैं और अपने पापों को धोते हैं।
वैधनाथ ज्योतिर्लिंग का मंदिर अपनी संरचना में गम्भीरता, शांति, और पवित्रता की अनुभूति कराता है और भक्तों को आत्मिक ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता है।
वैधनाथ ज्योतिर्लिंग के जीर्णाउद्धार में अहिल्याबाई होलकर का महत्वपूर्ण योगदान था। अहिल्याबाई होलकर, मराठा साम्राज्य की महारानी, ने 18वीं शताब्दी में वैधनाथ ज्योतिर्लिंग के मंदिर के पुनर्निर्माण और जीर्णावास के लिए महत्वपूर्ण योजनाएं बनाईं। उन्होंने धन और साधनों का समर्पण किया ताकि मंदिर को पुनः स्थापित किया जा सके और उसे उसके पूर्वावलोकन में सहायता प्रदान की जा सके।
अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए धनराशि और भूमि का योगदान किया, और उन्होंने विशेषज्ञ वास्तुकारों और कारीगरों को नियुक्त किया ताकि वे मंदिर को पुराने रूप में पुनर्निर्मित कर सकें। उनका योगदान इस प्रसिद्ध मंदिर को एक नया जीवंत और प्राचीन रूप देने में महत्वपूर्ण रहा। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप, वैधनाथ ज्योतिर्लिंग का मंदिर आज भी एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल के रूप में महत्वपूर्ण है। अहिल्याबाई होलकर के इस अद्भुत कार्य के लिए आज भी उन्हें सम्मान और प्रशंसा मिलती है।
इस मंदिर की स्थापना के संदर्भ में यह बात बताई जाती है कि रावण एक बहुत बड़ा शिव भक्त था और भगवान शिव को अपने साथ वरदान के रूप से ले जाने के लिए हिमालय पर जाकर भगवान शिव के लिए तप करने लगा। तप की अग्नि में वह एक एक करके अपने सिरों की आहुति देने लगा जब अंतिम सर को भी आहुति देने ही वाला था उसी क्षण भगवान शिव ने दर्शन दिए ।
भगवान शिव तपस्या से खुश होकर स्वयं का एक अंश रावण को दिया और बोले की तुम जहां इसको रखोगे वहीं मैं स्थापित हो जाऊँगा ,यह सुनकर रावण अति प्रसन्न हुआ और शिवलिंग को लेकर लंका की तरफ़ चल दिया। देवताओं ने रावण के इस कृत के पीछे की छिपी मंसा को समझा और उसे रोकने के लिए भगवान गणेश जी का आहवाहन किया।
गणेश जी ने बड़ी ही चतुराई से भेष बदलकर रावण को पानी पीने के लिए पूछा रावण बार बार मना करता रहा लेकिन गणेश जी के बार बार पूछने पर रावण ने पानी पी लिये और मानो उस एक घुटं में रावण ने पूरा समुद्र ही पी लिया हो और रावण को तुरंत ही पेसाब जाना पड़ा और तभी उसने शिवलिंग को गणेश जी के हाथों में थमाया और बोला कि मैं ना आऊ तब तक इसको अपने हाथों में रखना लेकिन जैसे ही रावण गया गणेश जी ने वहीं शिवलिंग को स्थापित कर दिया और आज यह वैधनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है।
आप नज़दीकी देवघर रेलवे स्टेशन से वैधनाथ ज्योतिर्लिंग आसानी से पहुँच सकते है। यहाँ से मंदिर की दूरी मात्र 3 किलोमीटर है।
देवघर एयरपोर्ट से मंदिर की दूरी मात्र 12 किलोमीटर है आप भारत की किसी भी जगह से मंदिर आसानी से पहुँच सकते है।
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